कथावस्तु अथवा विषय: 4/5
भाषा एवं लेखन: शैली- 4/5
शीर्षक: 5/5
महत्व: 5/5

आज सोशल मीडिया के कारण परस्पर पत्र- व्यवहार बिल्कुल समाप्त हो गया है। परंतु, पत्रों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि पत्र भाव-संप्रेषण का एक सशक्त माध्यम होते थे। इसीलिए कहानी, उपन्यास, गीत, ग़ज़ल, रिपोर्ताज़, यात्रा वृतांत, डायरी आदि साहित्य की विधाओं के समान ही पत्रों को भी साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त है क्योंकि कुछ पत्र भाव एवं भाषा दोनों ही दृष्टियों से समृद्ध होते हैं।

इस संदर्भ में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी द्वारा अपनी पुत्री प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जेल से लिखे गए पत्र उल्लेखनीय हैं।

पाठकों,आज आप आश्चर्य में पड़ गए होंगे कि मैं यहां पत्रों की चर्चा क्यों कर रही हूँ?

दरअसल आज जिस पुस्तक की समीक्षा लेकर मैं उपस्थित हुई हूँ वह स्वयं में अद्भुत है, अनूठी है क्योंकि यह विश्व की विविध क्षेत्रों की महान विभूतियों – दलाई लामा, श्री एम योगी, डेविड शिलिंग, किरण मजूमदार शॉ, मिल्खा सिंह, रघु राय ,मौरीन लिपमैन, स्टीफ़न वेस्टबी, माइकल हॉकनी, चेरी ब्लेयर, डॉ कर्ण सिंह, शर्मिला टैगोर, सर क्लिफ रिचर्ड आदि द्वारा अपनी मां को लिखे गए पत्रों का संकलन है। सच जानिए यह केवल पत्र ही नहीं है वरन बहुमूल्य दस्तावेज़ भी हैं जो तत्कालीन परिस्थितियों का इतिहास हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं।

इस पुस्तक में विश्वविख्यात विभूतियों की एक लंबी फेहरिस्त है जिसका अनुमान आप पुस्तक को पढ़कर ही लगा पाएंगे।

पुस्तक का शीर्षक है- सुनो माँ! (Suno Maa),’ यह पुस्तक अंग्रेजी में ‘डियर ममा’ नाम से 2021 में प्रकाशित हुई थी, जिसका संकलन प्रख्यात समाज सेविका मोहिनी केंट ने किया था । अब इसका हिंदी संस्करण पेपर बैक के रूप में इसी वर्ष 2024 में प्रकाशित होकर आप सभी के लिए उपलब्ध है।

इसके अनुवादक संदीप भूतोड़िया जी हैं । जिन्होंने अनुवाद करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि पत्रों के मूल भाव अर्थात उसकी आत्मा प्रत्येक स्थिति में बरकरार रहे।

मां सृष्टि का सर्वोत्तम उपहार है। वह जननी है, पालक है और भविष्य निर्मात्री है। परंतु, कुछ अपवाद भी हैं जिनमें माताओं ने स्वयं अपनी संतानों को शोषण और अत्याचार के कुंए में धकेल दिया है। ऐसी संतानों की वेदना को भी इस संकलन में बखूबी प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक का आरंभ मोहिनी केंट के उस वक्तव्य से हुआ है, जिसमें उन्होंने माँ की विस्तृत व्याख्या करते हुए माँ के दो परस्पर विरोधी पक्षों को पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया है।

इस पुस्तक में विविध क्षेत्रों के विश्व प्रसिद्ध व्यक्तियों के लगभग 65 पत्रों को संकलित किया गया है। इन पत्रों में एक माँ का जीवन संघर्ष है, उसके हाथ का स्वादिष्ट भोजन है, उसके आंचल की छांव है, त्याग है, समर्पण है, ममत्व है और स्मृतियों को जीवंत करता घर और गाँव है।

अनेक विभिन्नताओं से भरे पत्र जीवन के बहुरंगी पक्षों को लेकर मनुष्य मात्र को संघर्षों से जूझने, सकारात्मक सोच को जगाने और समूचे समाज को एक नई जीवन दृष्टि देने का कार्य करते हैं।

सुनो माँ! (Suno Maa) का कलेवर विस्तृत और आकर्षक है। रंगीन चित्र मन को लुभाते हैं तो अमीना, अंजू ,रेहाना, शीला, उषा और लिली जैसी पीड़िताओं के पत्र मर्माहत कर देते हैं।

भाषा की बात की जाए तो इसमें सर्वत्र विविधता के दर्शन होते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के भाव और उसकी भाषा एक दूसरे से सर्वथा भिन्न होती है। अनूदित पुस्तक होने के कारण अनुवादक का कार्य बहुत श्रमसाध्य हो जाता है। संदीप भूतोड़िया जी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने बहुत निष्ठा और लगन से अनुवाद कार्य किया है। यही कारण है कि पत्रों के भाव पाठकों तक सहज ही पहुंच जाते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति की भाव- संप्रेषण कला अर्थात लेखन- प्रक्रिया अलग-अलग होती है। अतः ‘सुनो माँ’ में वर्णनात्मक, चित्रात्मक आदि विभिन्न शैलियों के दर्शन होते हैं। परंतु, इन सबसे ऊपर इस पुस्तक का भाव पक्ष है।

पुस्तक सुनो माँ! (Suno Maa) का आवरण पृष्ठ जितना आकर्षक है उतने ही आकर्षक इस पुस्तक के अन्य चित्र भी हैं, जिनमें समाज के शोषित वर्ग के उत्थान के लिए किये जा रहे कार्यों को दर्शाया गया है।

मोहिनी केंट एक शैक्षिक संस्था चलाती है जिसका नाम ‘लिली: मानव तस्करी के विरुद्ध’, है जो लिली नाम की एक पीड़ित बच्ची के जीवन से प्रेरित है। लिली की माँ ने चार वर्ष की आयु में अपनी नशे की आदत के कारण अपनी बच्ची को बेच दिया था। शारीरिक शोषण की शिकार इस बच्ची को एक संस्था के द्वारा मुक्त कराया गया और आश्रय गृह में उसका पालन पोषण हुआ। अब यह बच्ची 22 वर्ष की युवती है और उसके जीवन का उद्देश्य सभी माताओं को बच्चों से प्यार करना सिखाना है।

संदीप भुट्टोडिया जी की यह पुस्तक मील का एक पत्थर है।

यह अनुपम है,अप्रतिम है। इसमें संकट पत्र अभिभूत करते हैं और समूची मातृ शक्ति का अभिनंदन और वंदन करते दिखाई देते हैं।

संदीप भुट्टोडिया जी बधाई के पात्र हैं जिन्होंने इस अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी में अनुवाद करके उसे भारतीय जनमानस तक पहुंचाने का श्रेयस्कर कार्य किया है।

मैं चाहती हूँ कि प्रत्येक वर्ग का पाठक जो किसी भी आयु, वर्ग, अथवा धर्म का हो इस पुस्तक को अपनी व्यस्त दिनचर्या में से थोड़ा सा समय निकालकर अवश्य पढ़े।

एक बार पुनः संदीप जी को उनकी सफल अनुवाद के लिए हार्दिक बधाई देती हूँ और उनके उज्जवल भविष्य हेतु अपनी शुभकामनाऐं प्रेषित करती हूँ।

आप सुनो माँ! (Suno Maa) को खरीदने के लिए इस लिंक का प्रयोग कर सकते हैं |