Reserved: One Won | Manu Saunkhala | Book Review

Reserved One Won by Manu Saunkhala
कहानी: 3.5/5
पात्र: 3/5
लेखन शैली: 3.5/5
उत्कर्ष: 3/5
मनोरंजन: 3.5/5  

21वीं सदी का प्रारंभ हिंदी भाषा और साहित्य के लिए सुखद रहा है, क्योंकि वह युवा पीढ़ी जो अंग्रेजी के आकर्षण में पूरी तरह बंध चुकी थी, अब उसने अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी में उत्कृष्ट साहित्य का सृजन करना प्रारंभ कर दिया है।

आज मैं जिस युवा कथाकार के उपन्यास पर चर्चा करना चाहती हूं वह उच्च शिक्षित और नई हिंदी के उभरते हुए कथाकार मनु सौंखला हैं।

अभी हाल ही में मैंने उनका उपन्यास Reserved: One Won पढ़ा । उपन्यास पर चर्चा करने से पूर्व मैं मनु सौंखला का अपने पाठकों से संक्षिप्त परिचय कराना अपना दायित्व समझती हूं। सौंखला जी मूलतः हिमाचल प्रदेश के निवासी हैं तथा उन्होंने राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (N.I.T.) से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है तथा वर्तमान में वह सार्वजनिक क्षेत्र की एक तेल कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत हैं।

Reserved: One Won उनकी हिंदी में प्रकाशित होने वाली पहली पुस्तक है। वह समाज से सरोकार रखने वाले व्यक्ति हैं और इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने एक ज्वलंत सामाजिक मुद्दे ‘आरक्षण’ को बहुत ईमानदारी से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है।

जहां तक उपन्यास के कथानक का प्रश्न है इसकी कहानी सीधे सपाट रास्तों पर बहुत सरलता से परस्पर तर्क करती हुई आगे बढ़ती चली जाती है।

92 पृष्ठों की छोटी सी पुस्तक को कथाकार ने कुल 17 छोटे-छोटे अध्यायों में विभाजित किया है। कहानी का प्रारंभ दो घनिष्ठ सहेलियों सनाया और अनन्या से होता है जो समाज के दो वर्गों सामान्य तथा आरक्षित से संबंध रखती हैं। इनमें से सनाया का चयन आरक्षण के आधार पर देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में हो जाता है जबकि अनन्या प्रवेश से वंचित रह जाती है। यहीं से इन दोनों सहेलियों की दोस्ती में दरार पड़ जाती है।

उपन्यास के तीसरे अध्याय से कथानक का वह अंश प्रारंभ हो जाता है जहां कालेज लाइफ, युवाओं की दिनचर्या, उनकी सोच आदि पर कथाकार ने प्रकाश डाला है।

एक सामान्य से दिखने वाले कथानक की सबसे बड़ी विशेषता है – एक सामाजिक मुद्दे को प्रमुखता से पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करना

Reserved: One Won की एक विशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह है कि कथाकार ने कहीं भी किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं किया है वरन उन्होंने सामान्य और आरक्षित दोनों वर्गों में स्वयं को रखकर गहन चिंतन और विचार के पश्चात ही दोनों वर्गों के पक्षों को बड़ी सच्चाई और निष्पक्षता के साथ प्रस्तुत किया है।

उपन्यास का कथानक बहुत सीधा सरल है जो एक ज्वलंत मुद्दे को लेकर शुरू हुआ था और जिसे आपसी सोच और परिपक्व विचारधारा के माध्यम से समाप्त भी किया गया है। यहां एक बात का उल्लेख अवश्य करना चाहूंगी कि लेखक ने उपन्यास में मध्यम मार्ग अपनाकर किसी भी विवाद में पड़ने से स्वयं को सुरक्षित रखा है। उपन्यास के कथानक का पूरा आनंद तो उसे पढ़कर ही प्राप्त किया जा सकता है।

Reserved: One Won उपन्यास की विवेचना यदि पात्रों और चरित्रों के आधार पर की जाए तो हम निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि इस दृष्टि से यह पूर्णत: सफल उपन्यास है क्योंकि 92 पन्नों के छोटे से कलेवर वाले इस उपन्यास में अधिक पात्रों की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

उपन्यास में सनाया,विहान,अक्षरा, नवीन,आरव, भाविका आदि को उपन्यास के प्रमुख पात्रों में रखा जा सकता है क्योंकि समूचा कथानक इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता है। इन पात्रों में कुछ आरक्षित वर्ग के हैं तो कुछ सामान्य तथा इन्हीं के माध्यम से उपन्यासकार ने आरक्षण के लाभ और दुष्प्रभावों को दर्शाया है।

इन सब के बीच एक नया किरदार गुड्डू भैया का भी पाठकों के सामने आता है। यह वह वर्ग है जिसने राजनीतिक लाभ के लिए आरक्षण का भरपूर दोहन किया है। एक संक्षिप्त उपन्यास और उसमें उसी के अनुपात में पात्रों की संख्या की दृष्टि से देखा जाए तो यह पूर्णत:सफल उपन्यास है।

अब बात करते हैं उपन्यासकार मनु सौंखला की लेखन-शैली की। उनका यह उपन्यास जितना सहज और सरल है उनकी लेखन शैली में भी यह सहजता सर्वत्र देखी जा सकती है। व्यवहारिक हिंदी के शब्दों का चयन उन्होंने बड़ी सुंदरता से किया है। उपन्यास में स्थान-स्थान पर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी उन्होंने किया है परंतु यह पात्रों के चरित्र के अनुसार अनिवार्य भी था। उपन्यास के बीच-बीच में छोटी-छोटी कविताओं ने उपन्यास में सौंदर्य का समायोजन तो किया ही है साथ ही साथ युवा मन के भावों को भी बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया है।

कहीं-कहीं संपादन की कमियों के कारण व्याकरणिक और मात्राओं की अशुद्धियां बाधा उत्पन्न करती हैं। उपन्यास में वाक्य की अशुद्धियां भी देखी जा सकती हैं जैसे-यह कौन बताया तुझे? आदि।

आवश्यकता के अनुसार उपन्यासकार ने उर्दू शब्दों का भी भरपूर प्रयोग किया है। इस प्रकार के प्रयोग उपन्यास के पात्रों को वास्तविकता के करीब ले जाते हैं। ऐसे उर्दू शब्दों में प्रमुख हैं – यकीन, एहसास, दिलों जान, खयाल, नज़दीकियां, सिर्फ, काबिल, खैरात आदि।

उपन्यास की एक विशेषता यह भी है कि कथाकार ने छोटे-छोटे वाक्यों और संवादों का प्रयोग करके उपन्यास को निरर्थक विस्तार से बचाया है।

जहां तक शीर्षक का प्रश्न है यह पाठकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता है। जैसा कि आजकल हिंदी पुस्तकों के शीर्षक अंग्रेजी में देने की परंपरा चल रही है, मनु सौंखला ने भी पुस्तक का शीर्षक अंग्रेजी में ही रखा है जो विषय के अनुकूल है और अपनी सार्थकता भी सिद्ध करता है।

उपन्यास आरक्षण की समस्या से आरंभ हुआ था और उसका समापन भी आरक्षण की समस्या पर ही हो जाता है। कथाकार ने इस पुस्तक के द्वारा आरक्षण पर विस्तार से चर्चा तो की है परंतु इस समस्या का कोई ठोस समाधान उन्होंने प्रस्तुत नहीं किया है। हां इस पुस्तक के द्वारा उन्होंने इतना अवश्य स्पष्ट किया है कि सामान्य और आरक्षित वर्ग के बीच जो गहरी खाई है उसे केवल अपनी सोच को बदल कर ही पाटा जा सकता है। परंतु उन्होंने इस प्रश्न को दरकिनार कर दिया है कि क्या आरक्षण अभी भी जरूरी है या इसे समाप्त कर देना चाहिए?

एक प्रेम कहानी के माध्यम से आरक्षण जैसे मुद्दे को उपन्यास में उठाया गया है। परंतु, मेरा यह मानना है इसे और भी अधिक रोचक और प्रभावशाली बनाया जा सकता था।

जो पाठक समयाभाव के कारण अधिक पृष्ठों की पुस्तक पढ़ने में असमर्थ रहते हैं, जो आरक्षण पर विभिन्न दृष्टिकोणों को जानना और उन पर विचार करना चाहते हैं उनके लिए यह उपन्यास उपयोगी है। परंतु, जो पाठक भरपूर मनोरंजन और भावना प्रधान उपन्यासों में रुचि रखते हैं उनके लिए मैं इस उपन्यास की संस्तुति नहीं करना चाहूंगी।

कथाकार मनु सौंखला का हिंदी में रचा गया यह प्रथम उपन्यास है और इसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। आज अंग्रेजी के प्रति अत्यधिक मोह को कम करने के लिए हमें ऐसे कथाकारों की बहुत आवश्यकता है जो हिंदी में लिखना चाहते हैं और हिंदी को उसका वह स्थान दिलाने के लिए प्रयासरत हैं जिसकी वह अधिकारिणी भी है।

Reserved: One Won को खरीदने के लिए आप इस लिंक का प्रयोग कर सकते हैं |

Amazon

Leave a Comment